Shiv Sena UBT Meeting: 18 जून को दिल्ली में हुई शिवसेना (यूबीटी) की अहम बैठक में 6 लोकसभा सांसद बिना सूचना के नदारद रहे। पार्टी ने व्हिप उल्लंघन का मामला मानते हुए सभी को कारण बताओ नोटिस जारी किया। जानिए इन सांसदों का राजनीतिक सफर, सीट समीकरण और इस अनुपस्थिति के मायने।
शिवसेना (UBT) की बैठक से गायब रहे ये 6 सांसद कौन हैं? पार्टी ने थमाया कारण बताओ नोटिस

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) यानी यूबीटी गुट के लिए बुधवार का दिन राजनीतिक रूप से बेहद असहज रहा। संसद भवन स्थित पार्टी कार्यालय में 18 जून को बुलाई गई आधिकारिक बैठक में लोकसभा के नौ में से केवल तीन सांसद पहुँचे, जबकि छह सांसद बिना किसी पूर्व सूचना के नदारद रहे। पार्टी नेतृत्व ने इस सामूहिक अनुपस्थिति को गंभीर अनुशासनहीनता और व्हिप का उल्लंघन मानते हुए सभी दोषी सांसदों को कारण बताओ नोटिस थमाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
क्या हुआ था 18 जून की बैठक में?
पार्टी प्रमुख और लोकसभा सांसद अनिल देसाई ने एक दिन पहले, 17 जून को, सभी सांसदों से बैठक में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने की अपील की थी। बावजूद इसके, गुरुवार की बैठक में गिने-चुने चेहरे ही दिखे:
· राज्यसभा से: संजय राउत मौजूद रहे।
· लोकसभा से: अनिल देसाई, अरविंद सावंत और राजाभाऊ वाजे ही पहुँचे।
वरिष्ठ सांसद अरविंद सावंत ने बैठक के बाद मीडिया से कहा, “यह पार्टी की आधिकारिक बैठक थी। इसमें शामिल न होकर इन सांसदों ने व्हिप का सीधा उल्लंघन किया है। सभी को कारण बताओ नोटिस जारी किया जा रहा है। अगर सात दिन के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो पार्टी नियमानुसार कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करेगी।”
कौन हैं वो 6 सांसद जो बैठक में नहीं पहुँचे?
बैठक से गैर-हाजिर रहने वाले सांसद महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों से आते हैं और पार्टी में इनका अलग-अलग राजनीतिक कद है।
1.संजय देशमुख – यवतमाल-वाशि
विदर्भ की इस अहम सीट से 2024 में पहली बार लोकसभा पहुँचे संजय उत्तमराव देशमुख अनुभवी सहकारिता नेता हैं।● ● शुरुआत: 1990 के दशक में शिवसेना से जुड़ाव।
● विधायकी: 1999 और 2004 में दिग्रस सीट से निर्दलीय विधायक रहे और 2001-2004 के दौरान महाराष्ट्र सरकार में खेल मंत्री का दायित्व भी संभाला।
● 2024 का समीकरण: यवतमाल-वाशिम में पाँच बार से काबिज शिवसेना (शिंदे गुट) की भावना गवली को टिकट न मिलने की नाराजगी का फायदा देशमुख ने उठाया और राजश्री पाटिल को हरा दिया।
● सहकारिता पृष्ठभूमि: वे 2008 से यवतमाल जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के निदेशक हैं।
2.संजय (बंडू) जाधव – परभणी
● बंडू’ के नाम से चर्चित संजय हरिभाऊ जाधव पार्टी के सबसे वफादार और तीन बार के सांसद हैं।
● लगातार जीत: 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव जीते।
● पार्टी में भूमिका: शिवसेना (यूबीटी) के उपनेता रह चुके हैं।
· विभाजन के समय रुख: 2022 में शिंदे गुट के बागी होने पर वे मजबूती से उद्धव ठाकरे के साथ खड़े रहे।
·● विधानसभा अनुभव: 2004 और 2009 में परभणी से विधायक रहे।
· ● 2024 की जीत: उन्होंने राष्ट्रीय समाज पार्टी के महादेव जानकर को हराया।
3. नागेश पाटिल आष्टीकर – हिंगोली
● मराठवाड़ा से आने वाले नागेश पाटिल जमीनी स्तर से उठकर सांसद बने नेता हैं।
· ● शिक्षा: एम.कॉम।
· ● राजनीतिक सफर: सरपंच से शुरू कर 2014 में हदगांव से विधायक बने।
·● 2024 का चुनाव: शिंदे गुट के बाबूराव कदम कोहलीकर को हराकर सांसद बने। इस सीट पर तत्कालीन सांसद हेमंत पाटिल का टिकट कटना बड़ी वजह बना था।
· ● सहकारिता: नांदेड़ जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के निदेशक हैं और पुराने शिवसैनिक माने जाते हैं।
4. भाऊसाहेब वाकचौरे – शिर्डी
● सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी भाऊसाहेब राजाराम वाकचौरे का राजनीतिक सफर कई पार्टियों से होकर गुज़रा है।
· ● पार्टी बदलाव: अलग-अलग समय पर शिवसेना, कांग्रेस और भाजपा में रहे।
· ● 2009 की सनसनी: कांग्रेस-एनसीपी के उम्मीदवार के रूप में पहला चुनाव लड़ा और रामदास आठवले को हराकर पूरे राज्य में चर्चा में आए।
· ● 2014-2019 का संघर्ष: कांग्रेस से हार के बाद भाजपा में गए, श्रीरामपुर विधानसभा चुनाव भी हारे। 2019 में बागी बनकर निर्दलीय लड़े और ज़मानत जब्त हुई।
· ● 2024 की वापसी: शिंदे गुट के तत्कालीन सांसद सदाशिव लोखंडे के खिलाफ नाराजगी का फायदा उठाकर जीते।
5.ओमराजे निंबालकर – धाराशिव (उस्मानाबाद
● 24 घंटे जनता के लिए उपलब्ध रहने वाले नेता के रूप में पहचाने जाने वाले ओमराजे निंबालकर लगातार दूसरी बार सांसद हैं।
6.संजय दीना पाटिल – मुंबई उत्तर-पूर्व
● राजनीतिक शुरुआत: कांग्रेस से करियर शुरू कर बाद में शिवसेना में आए।
● निंबालकर बनाम पाटिल: धाराशिव की राजनीति इन्हीं दो परिवारों के इर्द-गिर्द घूमती है।
● विधानसभा: पहले उस्मानाबाद से विधायक भी रहे। 2009 में राणाजगजीतसिंह पाटिल को हराया; 2014 में उनसे हारे।
● लोकसभा जीत: 2019 में राणाजगजीतसिंह पाटिल (तब राकांपा) को और 2024 में उनकी पत्नी अर्चना पाटिल (भाजपा) को बड़े अंतर से हराया।
राजनीतिक परिवार से आने वाले संजय दीना पाटिल की जड़ें मुंबई की स्थानीय राजनीति में गहरी हैं।
● पारिवारिक पृष्ठभूमि: पिता दीना पाटिल बड़े नेता और विधायक रहे, माँ मनोरमा पाटिल लंबे समय तक नगर निगम पार्षद रहीं।
● 2004: राकांपा से भांडुप विधानसभा सीट जीती।
● 2009 का उलटफेर: राकांपा के टिकट पर ही भाजपा के दिग्गज किरीट सोमैया को लोकसभा चुनाव में हराया।
● 2014 की हार के बाद: शिवसेना (यूबीटी) में शामिल हुए।
● 2024: भाजपा के मिहिर कोटेचा को हराकर पुनः लोकसभा पहुँचे।
● विवाद: राकांपा नेता नवाब मलिक से उनका राजनीतिक टकराव चर्चित रहा है।
अनुपस्थिति के राजनीतिक मायने क्या हैं?
शिवसेना (यूबीटी) के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, यह सामूहिक अनुपस्थिति महज़ इत्तेफाक नहीं है। कहा जा रहा है कि:
1● नाराजगी की ख़बरें: कुछ सांसद पार्टी में लगातार उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। खासकर वे सांसद जो मूल रूप से कांग्रेस या राकांपा से आए हैं, उनकी संगठन में भूमिका को लेकर असहजता की चर्चा है।
2● शिंदे गुट का प्रभाव: विदर्भ और मराठवाड़ा के कई इलाकों में शिंदे गुट लगातार यूबीटी के नेताओं को अपने पाले में खींचने का प्रयास कर रहा है। इस अनुपस्थिति को उसी दबाव का नतीजा माना जा रहा है।
3● 2024 की जीत का घमंड? कई नवनिर्वाचित सांसद जो लोकप्रियता के बल पर जीते हैं, उनके और पार्टी हाईकमान के बीच टकराव के संकेत मिल रहे हैं।
पार्टी नेतृत्व का इस मामले में सख्त रुख यह संकेत देता है कि उद्धव ठाकरे किसी भी कीमत पर पार्टी अनुशासन से समझौता नहीं करना चाहते। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कारण बताओ नोटिस का ये छहों सांसद क्या जवाब देते हैं और क्या पार्टी वाकई बर्खास्तगी जैसी बड़ी कार्रवाई का जोखिम उठाएगी?