Golali Karimi Controversy: तालिबान के मुख्य प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद को ब्लॉक करने वाली पूर्व अफगान टीवी प्रज़ेंटर गोलाली करीमी ने कपड़ों की आलोचना पर कहा- “मैं वही पहनूंगी जिसमें खुश और सेक्सी महसूस करूं।” पढ़ें कंधार से पेरिस तक की पूरी कहानी।
अफ़गानिस्तान में औरतों पर जुल्म की चर्चा हो, मेरे कपड़ों की नहीं’: गोलाली करीमी का विवादित बयान

पेरिस/काबुल, 22 जून 2026: अफ़गानिस्तान की पूर्व टीवी प्रज़ेंटर और पत्रकार गोलाली करीमी इन दिनों सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस का केंद्र बनी हुई हैं। फ्रांस में रहकर मॉडलिंग और सिनेमा में करियर बना रहीं करीमी के पहनावे और लाइफ़स्टाइल पर अफ़गान नागरिकों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है, जिसके जवाब में करीमी ने दो टूक कहा कि असली बहस अफ़गानिस्तान में महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों पर होनी चाहिए, न कि उनके कपड़ों पर।
कंधार से पेरिस’ तक का सफर
गोलाली करीमी मूल रूप से कंधार के किजिलबाश समुदाय से आती हैं। अफ़गानिस्तान में उन्होंने शमशाद टीवी और लेमर टीवी जैसे चैनलों पर पत्रकारिता की, जिसके बाद वे पेरिस स्थित बेगम टीवी से जुड़ीं। वर्तमान में वे फ्रांस में मॉडल के रूप में सक्रिय हैं और इंस्टाग्राम (2.8 लाख फ़ॉलोअर्स) तथा टिकटॉक (2.3 लाख फ़ॉलोअर्स) पर काफी लोकप्रिय हैं।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
2 जून 2026 को डॉयचे वेले दारी ने ‘कंधार से पेरिस: गोलाली करीमी की विवादित कहानी’ शीर्षक से एक वीडियो रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट में दिखाया गया कि सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में अफ़गान यूज़र्स करीमी के पहनावे और जीवनशैली को अफ़गानिस्तान की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के ख़िलाफ़ बता रहे हैं।
इस आलोचना का करारा जवाब देते हुए करीमी ने कहा, “मैं वैसे कपड़े पहनना चाहती हूँ जिनमें मैं ख़ुद को सेक्सी और खुश महसूस करूँ। मैं अब सिनेमा और मॉडलिंग कर रही हूँ, इसलिए यहाँ के कपड़े अफ़ग़ानिस्तान से अलग हैं।”
तालिबान प्रवक्ता को ब्लॉक करने की कहानी
इंटरव्यू में करीमी ने चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया कि उन्होंने पहले तालिबान के मुख्य प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद का इंटरव्यू लिया था। बाद में मुजाहिद ने उन्हें फोन और वॉइस मैसेज भेजकर कहा कि “एक मुस्लिम और पश्तून लड़की होने के नाते तुम्हें अपने पहनावे का ध्यान रखना चाहिए।”
करीमी ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “मैंने जवाब देने के बजाय उन्हें सीधे ब्लॉक कर दिया। मैं अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहती थी।”
पेरिस में भी सुरक्षित नहीं: चार बार बदलना पड़ा घर
करीमी ने बताया कि पेरिस में रहते हुए भी उन्हें अफ़गान समुदाय के कुछ लोगों से ख़तरा महसूस हुआ। उन्होंने कहा, “पेरिस में अफ़गानिस्तान के कुछ लोगों ने मुझ पर हमला भी किया। मुझसे कहा गया कि तुम पश्तून लड़की हो, तुम्हें ऐसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए। सुरक्षा कारणों से मुझे अब तक चार बार अपना घर बदलना पड़ा है।”
यह बयान इस बात का संकेत है कि अफगान महिलाओं को विदेशों में भी सांस्कृतिक दबाव और रूढ़िवादी मानसिकता का सामना करना पड़ता है, चाहे वे कितनी ही आज़ाद जगह पर क्यों न रह रही हों।
‘बुनियादी अधिकारों पर चुप रहना सबसे बड़ी समस्या’
7 जून को अफ़गान ब्रॉडकास्टिंग नेटवर्क (ABN) से बातचीत में करीमी ने तालिबान शासन की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा, “जहाँ लोगों को अपने कपड़ों और दाढ़ी तक पर फ़ैसला लेने की आज़ादी नहीं है और डर का माहौल है, वहाँ बुनियादी अधिकारों पर चुप रहना सबसे बड़ी समस्या है।”
सोशल मीडिया पर दो धड़े
करीमी के बयान ने सोशल मीडिया को दो खेमों में बाँट दिया:
आलोचना का स्वर
● वतनदोस्त नामक यूज़र ने लिखा, “यह आज़ादी नहीं बल्कि अनैतिकता का फैलाव है, जो पारंपरिक मूल्यों को ख़त्म कर रहा है।”
● गोरबोज ने आरोप लगाया कि करीमी ने “आज़ादी” के नाम पर अफ़गानिस्तान की राष्ट्रीय और ऐतिहासिक संस्कृति से मुँह मोड़ लिया है। उन्होंने यह भी कहा, “कंधार के किजिलबाश समुदाय से आने वाली गोलाली करीमी ने शर्म और नैतिकता की सभी सीमाएँ पार कर दी हैं।”
समर्थन की आवाज़
● हबीब ख़ान ने लिखा, “तालिबान उनके जैसी पश्तून महिलाओं को ख़तरा मानता है क्योंकि तालिबान के ज़्यादातर सदस्य भी पश्तून हैं।”
● महमूदी ने करीमी का बचाव करते हुए लिखा, “पश्चिमी देशों में लोग कपड़ों पर ध्यान नहीं देते। अफ़ग़ानिस्तान में हर दिन बलात्कार, अपराध, अपहरण और दमन की ख़बरें आती हैं। असली चिंता उन मुद्दों पर होनी चाहिए।”
बड़ा संदर्भ: तालिबान के अधीन अफ़गान महिलाएँ
गोलाली करीमी का विवाद ऐसे समय पर सामने आया है जब अफ़गानिस्तान में तालिबान शासन के तहत महिलाओं के अधिकार लगातार सीमित किए जा रहे हैं। लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध, महिलाओं के सार्वजनिक स्थानों पर आने-जाने पर पाबंदी और ब्यूटी पार्लर बंद करने जैसे फ़रमानों के बीच, करीमी का खुला विद्रोह कई लोगों को प्रेरित तो करता है, लेकिन कई इसे “सांस्कृतिक विमुखता” भी मानते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि करीमी की कहानी एक बड़े द्वंद्व को रेखांकित करती है: एक ओर पश्चिम में बस चुकी अफगान महिलाओं की व्यक्तिगत आज़ादी की चाहत है, तो दूसरी ओर एक ऐसे समाज की अपेक्षाएँ जो अभी भी गहरे रूढ़िवादी मूल्यों में जकड़ा हुआ है।
फिलहाल, गोलाली करीमी अपने रुख पर कायम हैं। उनका कहना है कि वे न तो अपने कपड़े बदलेंगी, न ही अपनी आवाज़ दबाएँगी। उनका संदेश साफ है: “अफ़ग़ानिस्तान में औरतों पर होने वाले जुल्म की चर्चा करो, मेरे कपड़ों की नहीं।”