नाना पाटेकर नहीं रहे: ‘मौत ही है जो हमेशा साथ रहती है’—एक पत्रकार की निजी यादों में बसे नाना


Nana Patekar Death Tribute: 8 अक्टूबर 2026 को नाना पाटेकर का निधन। एक वरिष्ठ फिल्म पत्रकार की नज़र से—मार्तंड चौक की क्रिकेट से लेकर खड़कवासला फार्महाउस तक, नाना के साथ बिताए पलों और उनके अनकहे किस्सों की दिल छू लेने वाली दास्तान।

मुंबई, 09 अक्टूबर 2026: गुरुवार सुबह-सुबह टीवी खोलते ही एक मनहूस ख़बर सामने आई—नाना पाटेकर नहीं रहे। 8 अक्टूबर 2026 को इस महान अभिनेता ने दुनिया को अलविदा कह दिया। नाना मेरे लिए सिर्फ़ एक अभिनेता या सितारा नहीं थे। मैं उनसे बहस कर लेता था, झगड़ लेता था, अपनी बात मनवा लेता था—और वह भी कई बार बड़े भाई की तरह मेरी बात मान लेते थे। किसी के जाने के बाद उसकी ज़िंदगी से जुड़ी यादों की पूरी फ़िल्म आँखों के सामने चलने लगती है। नाना के जाने की ख़बर भी मेरे लिए एक लंबे सफ़र के ख़त्म होने जैसी है।

मार्तंड चौक पर नाना के साथ क्रिकेट

मुझे आज भी वह दिन याद है। इंदौर के जाने-माने विद्वान और रंगकर्मी वसंत दादा पोद्दार के यहाँ मैं नाना से मिलने गया था। मार्तंड चौक पर कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। नाना अचानक वहाँ गए और क्रिकेट खेलने लगे। मैं भी शामिल हो गया। उस समय मैं शायद हायर सेकेंडरी में था या कॉलेज के पहले साल में। नाना तब आज जितने बड़े नाम नहीं थे। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मैं उस दिन किसी आम नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण घटना में शामिल था।

‘चाय पिएगा?’—जब शुरू हुआ ज़िंदगी भर का रिश्ता

सालों बाद मैं मुंबई आ गया। नाना को उनके लैंडलाइन पर फ़ोन किया और मिलने की इच्छा जताई। उन दिनों वह लोखंडवाला में ससुराल रेस्तरां के ऊपर रहते थे। औपचारिक बातचीत के बाद नाना ने पूछा—“चाय पिएगा?” मैंने हाँ में सिर हिलाया। उन्होंने कहा—“मेरे लिए भी बना लो।” मैं कुछ पल के लिए चौंक गया था। लेकिन कुछ ही घंटों में एक ऐसा रिश्ता शुरू हो गया, जो ज़िंदगी भर चलता रहा।

गणपति के दिन और ‘टोणग्या, तुझा होता म्हणून झाला’

मैं लगभग हर साल उनके गणपति में जाता था। नाना गणपति को बहुत श्रद्धा और दिल से मनाते थे। जब तक गणपति उनके घर में रहते, उन्हें वहाँ से निकालना लगभग असंभव होता था। एक बार उनकी फ़िल्म ‘कमाल धमाल मालामाल’ रिलीज़ होने वाली थी। गणपति के दौरान इंटरव्यू तय हुआ, लेकिन नाना ट्रैफ़िक में फँसकर देर से पहुँचे और बेहद ग़ुस्से में थे। प्रोडक्शन टीम को डाँट लगाने लगे। तब प्रचार टीम की एक सदस्य ने मुझसे कहा कि आप ही बात कर लो, वरना इंटरव्यू नहीं हो पाएगा।

मैं भी हिम्मत करके उनके पास गया और कहा—“नाना, ये मेरा इंटरव्यू है।” तब वह थोड़ा शांत हुए और बोले—”पता नहीं यार, ये कौन-सा ताजमहल है, जो मुझे इतनी दूर बुलाया है।” इंटरव्यू बहुत अच्छा हुआ। जाते समय उन्होंने कहा—”टोणग्या, तुझा होता म्हणून झाला।” यानी तेरे लिए था, इसलिए हो गया।

नए कलाकारों के लिए मज़बूत सहारा

समय के साथ रिश्ता और गहरा होता गया। नाना के खड़कवासला वाले फ़ार्महाउस में वसंतोत्सव होता था। मैं वहाँ भी जाता था। एक बार नाना ने एक लड़के से मिलवाया और कहा कि वह बहुत अच्छा गाता है—यह दिवंगत शास्त्रीय गायक वसंतराव देशपांडे का पोता है। उस लड़के ने बहुत अच्छा गाया। वही लड़का आगे चलकर मशहूर गायक पंडित राहुल देशपांडे बना। नाना हमेशा नए और प्रतिभाशाली कलाकारों के साथ एक मज़बूत सहारे की तरह खड़े रहे।

‘ये दो बैल हैं और हम दोनों’

साल 2007 में एक दिन नाना का फ़ोन आया—”क्या कर रहा है?” मैंने कहा—”ऑफ़िस में हूँ।” उन्होंने कहा—“घर आ जा।” मैं गाड़ी लेकर माटुंगा की तरफ़ निकल गया। फिर पता चला कि वह पुणे वाले फ़ार्महाउस पर हैं। मैं पूरी यूनिट लेकर फ़ार्महाउस पहुँच गया। नाना खेत में काम कर रहे थे—दादा कोंडके की तरह हाफ़ पैंट और नेहरू टोपी पहने हुए। मैंने पूछा—”क्यों बुलाया?” उन्होंने कहा—”ये दो बैल हैं और हम दोनों। चलो, मिलकर खेती करेंगे।” मैं हँस पड़ा। इसके बाद झूले पर बैठकर एक यादगार इंटरव्यू हुआ। नाना ने अपने खेत के बैंगन की सब्ज़ी बनवाई और हमने साथ बैठकर खाई।

‘मौत ही है, जो हमेशा साथ रहती है’

जाते समय नाना मुझे खेत के एक कोने में ले गए और कहा कि उनके जाने के बाद उन्हें वहीं दफ़ना देना या अंतिम संस्कार कर देना। उनका आख़िरी ठिकाना वही होना चाहिए। मैंने कहा—”ऐसी बातें मत करो, अभी बहुत समय है।” उन्होंने कहा—”मौत ही है, जो हमेशा साथ रहती है। उसे भूलकर फ़ायदा नहीं है।” मैं मुंबई लौट आया। कुछ समय बाद वह बात यादों में कहीं दब गई—लेकिन आज वह वाक्य गूँज रहा है।

नाना और अशोक सराफ़ की दोस्ती

नाना और अशोक सराफ़ की दोस्ती भी अपने आप में एक मिसाल थी। दोनों रंगमंच के दिनों से दोस्त थे। उन दिनों नाना को एक शो के 50 रुपये मिलते थे और अशोक सराफ़ को 250 रुपये। नाना मज़ाक में पाँच रुपये लेकर अशोक सराफ़ की चंपी कर देते थे। अशोक जानते थे कि नाना को पैसों की ज़रूरत है। एक बार गणपति के दिनों में नाना के पास पैसे नहीं थे। अशोक सुबह-सुबह उनके पास पहुँचे और एक ब्लैंक चेक देते हुए कहा कि खाते में 15 हज़ार रुपये हैं, जितने चाहिए निकाल लेना। सालों बाद नाना ने तीन हज़ार रुपये लौटाए। अशोक सराफ़ ने मज़ाक में कहा—”पाटेकर, अब तुम पैसे वाले हो गए हो।” नाना ने कहा—“पैसा वापस करने लायक तो हो गया हूँ, लेकिन समय वापस नहीं कर पाऊँगा।”

समय की क़द्र और खाने की बर्बादी से नफ़रत

एक बार नाना ने एक प्रोड्यूसर को फ़ोन करके कहा कि एक बहुत अच्छी स्क्रिप्ट सुनने के लिए लोग भेजो। दोपहर तीन बजे पुणे के फ़ार्महाउस पर आ जाना। मैंने उस प्रोड्यूसर से ख़ास तौर पर कहा था कि नाना समय को लेकर बहुत सख़्त हैं, समय पर पहुँचना। लेकिन ट्रैफ़िक और दूसरी वजहों से वह टीम शाम 4:45 बजे पहुँची। नाना बाहर खड़े थे। उन्होंने ग़ुस्से में कहा कि जो लोग समय की क़द्र नहीं करते, उनके साथ वह काम नहीं करेंगे। उन्होंने उन्हें वापस जाने को कह दिया। पानी तक नहीं पूछा। नाना ने कहा कि उन्होंने सबके लिए खाना बनाया था, इंतज़ार करते रहे, ख़ुद भूखे बैठे रहे और उन लोगों ने खाना भी ख़राब करवा दिया। नाना किसानों के दर्द को भीतर से महसूस करते थे। खाने की बर्बादी भी उन्हें उतनी ही तकलीफ़ देती थी।

विवाद और क़ानूनी परेशानियाँ

नाना के करियर के साथ विवाद भी जुड़े रहे। तनुश्री दत्ता ने फ़िल्म ‘हॉर्न ओके प्लीज़’ की शूटिंग के दौरान नाना पाटेकर पर शारीरिक उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इस आरोप के बाद नाना को काफ़ी विवाद और क़ानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ा। नाना ने इन आरोपों से लगातार इनकार किया। बाद में इस मामले में दर्ज शिकायत को अदालत ने ख़ारिज कर दिया था।

किरदार को अपने तरीक़े से जीने की बेचैनी

बतौर पत्रकार उनके काम को क़रीब से देखने का मौक़ा मिला। नाना का अभिनय कभी सिर्फ़ संवाद बोलना नहीं रहा। उनके भीतर रंगमंच की गहरी पकड़ थी और किरदार को अपने तरीक़े से जीने की एक बेचैनी भी। ‘परिंदा‘, ‘अंकुश‘, ‘प्रहार‘, ‘क्रांतिवीर‘ और ‘अब तक छप्पन‘ जैसी फ़िल्मों में उनके अलग-अलग रंग दिखाई दिए। ‘अब तक छप्पन’ के बाद हाल ही में मराठी फ़िल्म ‘नटसम्राट‘ में उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह विश्वस्तरीय अभिनेता हैं। इस फ़िल्म के बाद उनसे हुई बातचीत में पहली बार ऐसा महसूस हुआ कि उनके भीतर का अभिनेता अपने काम से बेहद ख़ुश है।

अपनी भाषा और अपनी शर्तों के साथ

नाना को समझने का एक दूसरा पहलू भी था। मुंबई की ‘बंबईया संस्कृति’ के साथ उनका तालमेल कभी सहज नहीं रहा। वह अपने स्वभाव, अपनी भाषा और अपनी शर्तों के साथ रहे। फिर भी वह इस शहर और फ़िल्म इंडस्ट्री में इतने लंबे समय तक टिके रहे—शायद इसलिए कि उन्होंने अपने काम से अपनी जगह बनाई और किसी दूसरे ढाँचे में फ़िट होने की कोशिश नहीं की।

आख़िरी बातचीत

अभी कुछ ही समय पहले उनसे आख़िरी बातचीत हुई थी। मैंने कहा था कि एक स्क्रिप्ट सुनानी है। उन्होंने बड़े उत्साह से पूछा—”प्रोड्यूसर मिल गया?” मैंने कहा—”हाँ।” उन्होंने कहा कि वह गोवा में हैं। पुणे पहुँचने के बाद फ़ोन करेंगे, वहाँ आना और कहानी सुनाना। अगर पसंद आई तो तुम्हारे लिए कर सकता हूँ। वह दिन अब कभी नहीं आएगा। यही बात सबसे ज़्यादा खलती है।

एक बेहतरीन कलाकार या उससे भी बेहतर इंसान?

कभी-कभी सोचता हूँ कि नाना को आख़िर परिभाषित कैसे किया जाए? क्या वह ऐसे इंसान थे, जो हद दर्जे तक समय के पाबंद थे? या वह आदमी, जिसका दिल किसी से लग जाता था तो फिर उसके साथ जमकर मस्ती करता था, दोस्तों और फ़िल्म यूनिट के लिए खाना बनाता था और लोगों की मदद के लिए खड़ा हो जाता था? या वह नाना, जो किसानों के दर्द को भीतर से महसूस करता था, जिसने पानी की कमी को समझा और उसके लिए दिल लगाकर काम किया? या वह इंसान, जो किसी इंसान को पसंद आने पर ही फ़िल्म करता था, वरना नहीं?

ज़िंदगी ने उन्हें तल्ख़ बनाया, लेकिन दिल ऐसा दिया कि लोग उनसे बेहद प्यार करें। तो क्या थे नाना? एक बेहतरीन कलाकार या उससे भी बेहतर इंसान? जो भी थे, एक बात तय है—नाना को कोई भुला ही नहीं सकता।

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