June 2026 Driest Month: भारत में जून 2026 में सामान्य से 39.8% कम बारिश हुई। यह 1901 के बाद 5वाँ सबसे सूखा जून है। अल नीनो, मानसून की देरी और दो सप्ताह की रुकावट बनी बड़ी वजह। जानिए खेती, पानी और जुलाई के पूर्वानुमान पर पूरी रिपोर्ट।
नई दिल्ली, 01 जुलाई 2026: भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने बुधवार को चौंकाने वाले आँकड़े जारी करते हुए बताया कि जून 2026 देश के लिए 125 वर्षों में पाँचवाँ सबसे सूखा महीना साबित हुआ। इस दौरान कुल 99.5 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य औसत 165.3 मिलीमीटर से 39.8 प्रतिशत कम है। मानसून का देरी से आना और उसके बाद करीब दो सप्ताह तक ठहर जाना इस भारी कमी की प्रमुख वजह रही।

क्यों इतनी कम रही बारिश? तीन बड़ी वजहें
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस असामान्य शुष्कता के पीछे तीन प्रमुख कारक जिम्मेदार रहे:
- मानसून की देरी: इस वर्ष मानसून ने केरल में सामान्य तिथि से तीन दिन बाद दस्तक दी।
- दो सप्ताह की रुकावट: केरल पहुँचने के बाद मानसून की रफ्तार धीमी पड़ गई और पश्चिमी भारत के खेती वाले इलाकों में इसका आगे बढ़ना लगभग 14 दिनों तक थमा रहा। इस ठहराव ने देश के बड़े हिस्से को बारिश से वंचित रखा।
- अल नीनो का प्रभाव: प्रशांत महासागर में सक्रिय अल नीनो की स्थिति को मानसून की कमज़ोरी के लिए प्रमुख रूप से ज़िम्मेदार माना जा रहा है।
IMD ने पूरे मानसून सीज़न (जून से सितंबर) के लिए पहले ही बारिश का अनुमान सामान्य से कम यानी दीर्घकालिक औसत का लगभग 90 प्रतिशत रखा है।
125 वर्षों का रिकॉर्ड: 2026 का जून कहाँ ठहरता है?
1901 के बाद से केवल चार अवसरों पर जून में इससे भी कम बारिश दर्ज की गई है। हालाँकि यह सबसे खराब नहीं है, लेकिन यह एक दशक से अधिक समय में सबसे शुष्क जून अवश्य है। IMD के आँकड़े बताते हैं कि इससे पहले 2009 और 2014 का जून और भी कमज़ोर रहा था।
कमज़ोर जून का मतलब कमज़ोर मानसून? इतिहास क्या कहता है
मौसम विभाग ने 1951 से 2025 तक के रिकॉर्ड का विश्लेषण किया तो एक दिलचस्प तथ्य सामने आया:
· इन 74 वर्षों में 26 बार जून की बारिश सामान्य से कम रही।
· इनमें से केवल 8 साल (31%) में पूरा मानसून सीज़न भी कमज़ोर रहा।
· 15 साल (58%) में जुलाई से सितंबर की बारिश ने कमी पूरी कर दी और पूरा सीज़न सामान्य रहा।
· 3 साल (12%) में तो पूरा सीज़न सामान्य से अधिक बारिश के साथ समाप्त हुआ।
दो ऐतिहासिक मिसालें:
· 2019: जून में सामान्य से 31% कम बारिश हुई, लेकिन सीज़न के अंत तक बारिश सामान्य से 12% अधिक दर्ज की गई।
· 2009: जून में 47% कम बारिश हुई और पूरा सीज़न सूखे की चपेट में रहा।
बड़ा सवाल यही है — क्या 2026 का मानसून 2019 की तरह वापसी करेगा या 2009 की तरह निराश करेगा? अल नीनो की सक्रियता को देखते हुए विशेषज्ञ इस बार अधिक सतर्क हैं।
जून में गर्मी से नहीं मिली राहत
बारिश की अनुपस्थिति का सीधा प्रभाव तापमान पर पड़ा। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में पारा 42 डिग्री सेल्सियस के पार बना रहा और लू का प्रकोप जारी रहा। आमतौर पर जून के अंतिम सप्ताह तक मानसून की बारिश से राहत मिल जाती है, लेकिन इस बार लंबी गर्मी ने लोगों को बेहाल रखा।
दिल्ली का हाल: चौथा सबसे सूखा जून
राजधानी दिल्ली में पूरे जून में मात्र 32.92 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई और केवल चार दिन बारिश हुई। पिछले 16 वर्षों (2011-2026) में यह चौथा सबसे सूखा जून रहा। इससे पहले 2019 (11.2 मिमी), 2012 (15.5 मिमी) और 2022 (24.5 मिमी) में इससे भी कम बारिश हुई थी।
गौरतलब है कि इससे पहले के तीन वर्षों (2023, 2024, 2025) में दिल्ली ने खूब बारिश देखी थी, जहाँ जून का आँकड़ा 102 मिमी से 243 मिमी के बीच रहा।
तापमान के मोर्चे पर दिल्ली का औसत अधिकतम तापमान 39.1 डिग्री रहा, जो 16 साल में सातवाँ सबसे अधिक है। सर्वाधिक तापमान 9 जून को 43.5 डिग्री दर्ज किया गया।
खेती और जल संकट पर गहराता प्रभाव
जून की शुष्कता का सबसे भारी दंश कृषि क्षेत्र पर पड़ा है:
· खरीफ फसलों की बुवाई पिछड़ी: धान, मक्का, कपास और सोयाबीन जैसी प्रमुख खरीफ फसलों की बुवाई पहली अच्छी बारिश पर निर्भर करती है। बारिश न होने से बुवाई का शेड्यूल बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
· सिंचाई पर दबाव: देश की लगभग आधी कृषि भूमि वर्षा-आधारित है, जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है।

· महाराष्ट्र में जलसंकट: जून के पहले पखवाड़े में राज्य में सामान्य से 75% कम बारिश हुई। मुंबई को पानी की आपूर्ति करने वाले प्रमुख जलाशय मध्य जून तक मात्र 10 प्रतिशत ही भर पाए थे।
आगे कैसा रहेगा हाल? जुलाई से उम्मीदें
IMD के अनुसार, जुलाई में स्थिति में कुछ सुधार संभव है। सोमाली जेट (हवाओं का एक मज़बूत प्रवाह) के सक्रिय होने से बारिश में वृद्धि की संभावना है। उम्मीद है कि मानसून जुलाई के पहले सप्ताह में दिल्ली, पंजाब और हरियाणा तक पहुँच जाएगा।
हालाँकि, विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि जुलाई के बड़े हिस्से में बारिश सामान्य से कम रह सकती है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जुलाई और अगस्त की बारिश जून की भारी कमी की कितनी भरपाई कर पाती है। पूरे खरीफ सीज़न और देश की खाद्य सुरक्षा का भविष्य इसी पर निर्भर करेगा।